वेदलक्षणा गोसंवर्धन

     पाश्चात्य सभ्यताओं से प्रभावित व प्रेरित आधुनिक भारत के निति निर्माताओं ने भाषायी एवं तकनीकी ज्ञान बढ़ाने के लिए एंव अधिक मात्रा में अन्न एवं दुग्ध उत्पादन के तात्कालिक लोभ से प्राकृतिक विज्ञान विहीन व परिणाम में विनाशकारी शिक्षाक्रान्ति, हरितक्रान्ति तथा श्वेतक्रान्ति योजनाओं द्वारा मानव को दानव, धरती को विकृत तथा धेनु को वर्णशंकर बना दिया। उसका फल यह हुआ है कि इस धरती पर मानवता परायण व्यक्तियों का तथा सात्विक आहार व शुद्ध पर्यावरण का अत्यन्त अभाव होता जा रहा है।

     अतः विवेकशील मानव को संस्कारयुक्त समझ, शुद्ध पर्यावरण तथा सात्विक आहार की उपलब्धता हेतु मानवता की दीक्षायुक्त शिक्षा का विस्तार करने के साथ ही वेदलक्षणा गोवंश का संवर्धन करना अनिवार्य हो गया है जिससे गोकृषि अन्न एवं गोदुग्धान्न के प्रयोग से सात्विक आहार तथा शुद्ध पर्यावरण को प्राप्त किया जा सके। इस लक्ष्य प्राप्ति को सामने रखकर श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा प्रेरित गोसेवाश्रमों एवं गोसमृद्धि ग्रामों में प्राकृतिक विज्ञान सम्मत वेदलक्षणा गोकृषि व गोदुग्धान्न उत्पादन हेतु गोसंवर्धन अभियान के अन्तर्गत पथमेड़ी (सांचोरी), कांकरेज, थारपारकर, राठी, साहीवाल, रेड सिन्धी, गिर एवं नायरी इन आठ वेदलक्षणा गो नस्लों का पारम्परिक व आधुनिक विधियों से संवर्धन करने का प्रयास किया जा रहा है।

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